तुलसी की खेती कैसे करें ?

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तुलसी की खेती से जुड़ी संपूर्ण जानकारी

तुलसी एक ऐसा पौधा है जिसका आध्यात्मिक महत्व होने के साथ ही इसका औषधीय महत्व भी है। हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे को काफी मान्यता मिली हुई है। माता लक्ष्मी का स्वरूप मानकर लोग घरों में तुलसी का पौधा लगाते हैं और इसके समक्ष दीप जला-कर इसकी पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि तुलसी को घर में लगाने से सुख-शांति और समृद्धि आती है। वहीं वैज्ञानिक दृष्टि से देखे तो जहां तुलसी का पौधा होता है वहां हवा स्वच्छ होती है। इस तरह तुलसी चारों दिशाओं को स्वच्छ करने का कार्य भी करती है। इसके औषधीय उपयोग भी बहुत है।

आयुर्वेद में इसका काफी वर्णन मिलता है। इसमें कई दवाओं के निर्माण में इसका प्रयोग किया जाता है। वर्तमान में चल रही कोरोना संक्रमण की बीमारी में भी तुलसी व गिलोय के सेवन को लाभप्रद माना जा रहा है। तुलसी में संक्रमण कम करने का गुण होता है। इसके सेवन से खांसी, जुकाम व बुखार में राहत मिलती है। इतने सारे औषधीय गुणों के कारण ही तुलसी को दवाइयाँ बनने में प्रयोग में लाया जाता है। बड़ी-बड़ी फार्मा कंपनियां इसकी क्रांन्टे्रक्ट पर खेती करवाती है क्योंकि उन्हें अपनी दवा बनाने के लिए अधिक मात्रा में तुलसी की आवश्यकता होती है। यदि व्यावसायिक तरीके से इसकी खेती की जाए जो अच्छी कमाई की जा सकती है। आइए जानते है कि किस प्रकार आप इसकी खेती करके अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। 

तुलसी के प्रकार

  1. श्याम तुलसी (काली तुलसी)
  2. राम तुलसी
  3. श्वेत / विष्णु तुलसी
  4. वन तुलसी / जंगली तुलसी
  5. नींबू तुलसी 

1. श्याम तुलसी ( काली तुलसी )

श्याम तुलसी राम तुलसी से ज्यादा गुणकारी होती है। श्याम तुलसी को कृष्ण तुलसी या काली तुलसी भी कहा जाता है। इसके पत्ते हल्के जामुनी या कृष्ण रंग के और इसकी मंजूरी जामुनी रंग की होती है। श्याम तुलसी की शाखाएं लगभग एक से तीन फुट ऊंची और बैंगनी आभा वाली होती है। इसके पत्ते एक से दो इंच लंबे एवं अंडाकार या आयताकार आकृति के होते हैं। कृष्ण तुलसी का प्रयोग विभिन्न प्रकार के रोगों और कफ की समस्या के लिए होता है। घरों में मुख्य रूप से राम तुलसी और श्याम तुलसी दोनों का ही प्रयोग किया जाता है। लेकिन राम तुलसी की अपेक्षा श्याम तुलसी अधिक गुणकारी होती है।

2. राम तुलसी

राम तुलसी में हल्के हरे रंग के पत्ते और भूरी छोटी मंजूरी वाली पत्तियों वाली तुलसी को राम तुलसी कहा जाता है। इस तुलसी की टहनियां सफेद रंग की होती है। इसकी शाखाएं भी श्वेतार्क वर्ण लिए होती है। इसकी गंध और तीक्षणता कम होती है। राम तुलसी का प्रयोग कई त्वचा संबंधी औषिधियों के रूप में किया जाता है। 


3. श्वेत / विष्णु तुलसी

श्वेत / विष्णु / श्री तुलसी की पत्तियां हरी होती है और इसके पत्र व शाखाएं श्वेताभ होते हैं। गुण-धर्म की दृष्टि से काली तुलसी को श्रेष्ठ माना गया है। 

4. वन तुलसी / जंगली तुलसी

जंगली तुलसी को वन तुलसी या तुलसी बर्बरी भी कहा जाता है। इसका पौधा 60-90 सेमी ऊंचा, सीधा और अनेक शाखाओं वाला होता है। इसके तने बैंगनी रंग के होते हैं, जो हमेशा रहते हैंं। इसके पत्ते सीधे, विपरीत, 2.5-5 सेमी लम्बे होते हैं। इसके फूल सुगन्धित, सफेद-गुलाबी अथवा बैंगनी होते हैं। इसके फल 2 मिमी लम्बे, थोड़े नुकीले, श्यामले रंग के, चिकने अथवा लगभग झुर्रीदार होते हैं। इसके बीज श्यामले रंग वर्ण के, अंडाकार तथा आयताकार होते हैं। जंगली तुलसी के पौधे में फूल और फल साल भर होते हैं।


5. नींबू तुलसी / लेमन तुलसी

तुलसी की यह किस्म लेमन ग्रास और तुलसी दोनों के गुणों से भरपूर है। लेमन ग्रास की तरह इससे नींबू की खुशबू आती है। इसमें काफी मात्रा विटामिन ‘ए’ होता है। 
 


तुलसी का औषधीय महत्व

गुण धर्म की दृष्टि से देखें तो तुलसी को सदियों से एक औषधि के रूप में भी प्रयोग किया जाता रहा है। वर्तमान में भी इसका इस्तेमाल कई बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है। सर्दी-खांसी से लेकर कई बड़ी बीमारियों में भी तुलसी एक कारगर दवा का काम करती है। आयुर्वेद में तुलसी को संजीवनी बूटी के समान माना गया है। आयुर्वेदिक चिकित्सा में तुलसी के पौधे के हर भाग को स्वास्थ्य के लिहाज से फायदेमंद बताया गया है। तुलसी की जड़, उसकी शाखाएं, पत्ती और बीज सभी का अपना-अपना अलग महत्व है। तुलसी शरीर का शोधन करने के साथ-साथ वातावरण का भी शोधन करती है तथा पर्यावरण संतुलित करने में भी मदद करती है। 

तुलसी लगाने का उचित समय

वैसे तो तुलसी को किसी भी मौसम में लगाया जा सकता है लेकिन बारिश में तुलसी का पौधा जल्दी व आसानी से उग जाता है। इसलिए इसे वर्षा ऋतु में लगाना श्रेष्ठ है। अन्य मौसमों में इसे लगाने पर इसमें पत्ते कम आते है और छोटे हो जाते हैं और शाखाएं भी सूखी नजर आने लगती है। जुलाई माह तुलसी के पौधे को खेत में लगाने का सबसे सही समय होता है। यदि इसकी बुवाई की बात करें तो अधिकांशतय: इसके बीज अप्रैल और मई माह के दौरान बोये जाते हैं और एक-दो सप्ताह के बाद बीजो के अंकुरित होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। वहीं इसके पौधों की रोपाई की बात करें सिंचाई क्षेत्रों में 6-10 सेंटीमीटर लंबे अंकुरित पौधों की जुलाई या फिर अक् अक्टूबर / नवंबर माह के समय खेतों में लगाया जाता है। 

खेत की तैयारी व बुवाई या पौधरोपण

खेत की तैयारी करते समय खेत को अच्छी तरह से जोतना बेहद जरूरी है। जमीन को अच्छी तरह से जोतकर क्यारियां बना लेनी चाहिए। चूंकी तुलसी के बीज काफी छोटे होते हैं इसलिए इन्हें रेत या लकड़ी के बुरादे के साथ मिश्रित करके मिट्टी में डाला जाता है। इसके बीजों को अच्छे से मिश्रित मिट्टी में रोप कर, तुरंत पानी देना चाहिए। तुलसी की फसल के लिए अच्छा व सर्टिफाइड बीज प्राप्त करने के लिए केंद्रीय औषधीय अनुसंधान संस्थान, लालकुआं ( नैनीताल ) से संपर्क किया जा सकता है। इसके अलावा यदि इसके पौधे खेत में रोप रहे हो तो ध्यान रहे इसके पौधे 45 से 50 सेंटीमीटर की दूरी लगाने चाहिए ताकि पौधे को फैलने के लिए पर्याप्त स्थान मिल सके। 


सिंचाई कार्य

पौधों को लगाने के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करना जरूरी है, इसके बाद हफ्ते में कम से कम एक बार या जरूरत के अनुसार पानी देना होता है। र्मियों में खेत में तुलसी के पौधों को 3-4 बार सिंचाई की आवश्यकता होती है जबकि शेष ऋतुओं की अवधि के दौरान जरूरत के मुताबिक सिंचाई की जा सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार फसल की कटाई से 10 दिन पहले से ही सिंचाई करना बंद कर देना चाहिए। 


खाद एवं उर्वरक

तुलसी के पौधों को कम उर्वरक की आवश्यकता होती है, इसीलिए ध्यान दें कि ज्यादा मात्र में उर्वरक डालने से पौधे को नुकसान हो सकता है। तुलसी के पौधों मैं कभी भी बहुत गरम और बहुत सर्द मौसम में उर्वरक नहीं डालना चाहिए। यदि आवश्यकता हो तो जैविक उर्वरक और तरल उर्वरक का प्रयोग किया जा सकता है।


गोबर की खाद होती है फायदेमंद

तुलसी के पौधे के लिए गोबर की खाद काफी फायदेमंद होती है। इसलिए 200 से 250 क्विंटल गोबर की खाद या कम्पोस्ट को जुताई के समय खेत में बराबर मात्रा में डाल देनी चाहिए। इसके बाद अच्छी तरह से जुताई कर देनी चाहिए ताकि खाद अच्छी तरह से मिट्टी में मिल जाए। 


पत्तियों की तुड़ाई / कटाई

रोपण के 90-95 दिनों के बाद, फसल प्रथम तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। पत्ती के उत्पादन के लिए फूलों के प्रारंभिक स्तर पर पत्तियों की तुड़ाई की जाती है। फसल को जमीनी स्तर पर इस तरीके से काटा जाता है कि शाखाओं को काटने के बाद तने फिर से उग आएं। जब पौधों की पत्तियां हरे रंग की होने लगें, तभी अच्छी धूप वाला दिन देख कर इनकी कटाई शुरू कर देनी चाहिए। सही समय पर कटाई जरूरी है, ऐसा न करने पर तेल की मात्रा पर इसका असर होगा। पौधे पर फूल आने के कारण भी तेल मात्रा कम हो जाती है, इसलिए जब पौधे पर फूल आना शुरू हो जाएं, तब इनकी कटाई शुरू कर देना चाहिए। इसके अलावा जल्दी नई शाखाएं आ जाएं, इसलिए कटाई 15 से 20 मीटर ऊंचाई से करनी चाहिए।

अनुमानित खर्चा व कमाई 

एक बीघा जमीन पर खेती करने के लिए 1 किलो बीज की आवश्यकता होगी। 10 बीघा जमीन पर 10 किलो बीज लगते हैं। इसकी कीमत 3 हजार रुपए के करीब होती है। खेत में 10 से 15 हजार रुपए की खाद लगेगी। इसकी एक सीजन में 8 क्विंटल तक पैदावार होती है। मंडी में 30 से 40 हजार रुपए प्रति क्विंटल के भाव तक तुलसी के बीज बिक जाते हैं। वहीं इससे प्राप्त सूखी पत्तियों को डाबर, पतंजलि व हमदर्द जैसी औषधि कंपनियां 7000 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीद लेती हैं। इसकी सूखी पत्तियों को आप सीधे मंडी में जाकर खरीददारों से संपर्क कर सकते हैं या कॉन्ट्रेक्ट फॉर्मिंग करवाने वाली दवा कंपनियों या एजेंसियों के जरिए खेती का माल बेच सकते हैं।