संतुलित मात्रा में उर्वरक के उपयोग से बढ़ती है फसलों की उत्पादन

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(रायपुर) आज की आधुनिक व रासायनिक खेती के दौर में उर्वरक, कीटनाशी औषधियों के असंतुलित उपयोग के दुष्प्रभाव से खाद्यान्न उत्पादन व जनसंख्या में वृद्धि का आनुपातिक संतुलन बनाये रखना चुनौती है। खाद्यानों की सुरक्षित व गुणवत्ता युक्त उत्पादन में प्रथम आवश्यकता निःसंदेह मिट्टी के प्रकार संरचना व उनमें पाये जाने वाले पोषक तत्वों की उपलब्धता पर निर्भर रहता है। आज फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के व्यावसायिक दृष्टिकोण से भूमि का अधिकाधिक दोहन करने के लिए विभिन्न प्रकार के रासायनों का असंतुलित ढंग से उपयोग किया जा रहा है। जिसके कारण खेतों की मिट्टी और उसकी उर्वरा शक्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। एक ग्राम मिट्टी में करोड़ों की संख्या मेें जीवाणु विद्यमान होते है, इन जीवाणुओं के सहयोग से ही पौधों का वृद्धि एवं विकास संभव हो पाता है परंतु उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से इनकी संख्या मंे भी दिनों-दिन कमी पायी जा रही है।
    

पौधों के वृद्धि एवं विकास हेतु कुल 16 तत्व आवश्यक होते है, इनमें तीन प्राथमिक तत्व कार्बन, हाईड्रोजन व आक्सीजन तीन मुख्य पोषक तत्व नाइट्रोजन, स्फूर, पोटाश है एवं तीन गौण तत्व कैल्शियम, मैग्निशियम व सल्फर है। सात सूक्ष्म अन्य तत्वों में लोहा, जस्ता, कापर, बोरान, मैग्नींज, कोबाल्ट, निकल है, जो पौधों के लिए अनिवार्य है। यहां यह बात उल्लेखनीय है इन पोषक तत्वों की आवश्यकता कम-ज्यादा मात्रा में जरूरत होती है किंतु इस सभी तत्वों का पौधों के वृद्धि एवं विकास के लिए बराबर की अहमियत है। जब भूमि में किसी तत्व की कमी हो जाती है, तो ऐसी स्थिति में उस तत्व की पूर्ति किये बिना निश्चित उपज प्राप्त करना सर्वथा असंभव हो जाता है। आज की सघनीकरण खेती के दौर में इन पोषक तत्वों का दोहन कुएं अथवा नलकूप से पानी निकालने के समान है और यदि निकाले गये पानी का पुनर्भरण न होने की संभावनाओं जैसे स्थिति निर्मित हो जाती है।
    

अतः विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में ली जाने वाली फसलों हेतु आवश्यकतानुसार पोषक तत्वों की जानकारी मिट्टी परीक्षण के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं है। जिस प्रकार मलेरिया जैसे संक्रामक रोग से उपचार हेतु खून की जांच कराई जाती है उसी प्रकार धान की फसल में खैरा नामक रोग, जिंक तत्व की कमी से होता है। इसकी जानकारी मिट्टी का परीक्षण कराकर ही पता की जा सकती है। इसको दूर करने हेतु 25 कि.ग्रा. प्रति हेक्टयर दर से उपयोग करना चाहिए।    
    

मिट्टी की अम्लीयता एवं क्षारीयता पी.एच. से मापी जाती है। मिट्टी का पी.एच. मान 7 से कम होने पर अम्लीय माना जाता है। सामान्यतः अम्लीय भूमि में चूना का उपयोग 2-2.5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से किया जाना चाहिए। मिट्टी का पी.एच. मान 7 से अधिक होने पर क्षारीय माना जाता है, सामान्यतः क्षारीय मिट्टियों में जिप्सम 2.5 क्विंटल प्रति हेक्टयर के मान से करना लाभप्रद होता है। इसी प्रकार अन्य पोषक तत्व जैसे नत्रजन, स्फूर व पोटाश की मिट्टी में उपलब्ध मात्रा ज्ञात कर बोयी जाने वाली फसलों के अनुसार खाद व उर्वरकों की संतुलित मात्रा में अनुशंसानुसार उपयोग करना चाहिए।
  

संतुलित मात्रा में उर्वरकों का उपयोग मृदा स्वास्थ्य कार्ड में दिये गये अनुशंसानुसार करना चाहिए। सामान्यतः मिट्टी परीक्षण का परिणाम तत्वों की उपलब्धता अतिअल्प, कम, मध्यम व उच्च में दिया जाता है। तत्व की उपलब्धता का परिणाम अतिअल्प होने की स्थिति में फसलों के लिए उर्वरक की अनुशंसित मात्रा में ढेड़ गुना उपयोग किया जाना चाहिए। तत्व की उपलब्धता कम होने की स्थिति में फसलों के लिए उर्वरक की अनुशंसित मात्रा से सवा गुना उपयोग किया जाना चाहिए। मध्यम होने की स्थिति में अनुशंसित मात्रा के बराबर व उच्च होने की स्थिति में अनुशंसित मात्रा में आधा उपयोग किया जाना चाहिए।
    

कृषि विभाग ने किसानों से अपनी आवश्यकतानुसार रासायनिक उर्वरकों का प्राथमिक सहकारी समितियों से अग्रिम रूप से उठाव करने की अपील की गई है, ताकि खरीफ सीजन के दौरान खाद के लिए परेशान न होना पड़े। राज्य के सभी सोसायटियों में पर्याप्त मात्रा में विभिन्न प्रकार के रासायनिक उर्वरकों का पर्याप्त स्टाक उपलब्ध है। अधिक जानकारी के लिए क्षेत्रीय कृषि अधिकारी अथवा किसान हेल्प लाईन टोल फ्री नं. 18002331850 संपर्क करें।

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