राष्ट्रीय कृषि मेला: ग्रामीण महिलाएं जुडेंगी पशुधन नस्ल सुधार कार्यक्रम से

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(रायपुर) ग्रामीण महिलाएं जल्द ही उन्नत पशु नस्ल सुधार कार्यक्रम से जुडेंगी। कृषि मंत्री श्री रविन्द्र चौबे के मार्गदर्शन और कृषि उत्पादन आयुक्त श्रीमती मनिन्दर कौर द्विवेदी की पहल से कांकेर, राजनांदगांव, गरियाबंद जिले की महिला समूहों ने उन्नत पशु नस्ल सुधार प्रशिक्षण में शामिल होने की सहमति व्यक्त की। प्रदेश में नस्ल सुधार कार्यक्रम के तहत राज्य की महिलाओं को पहली बार बहुद्देशीय कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ता (मैत्री) का प्रशिक्षण दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि महिलायें राजधानी रायपुर में आयोजित राष्ट्रीय कृषि मेला में बकरी पालन और मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लेने आई थीं।

कृषि उत्पादन आयुक्त श्रीमती मनिंदर कौर द्विवेदी से हुई चर्चा के दौरान इन महिलाओं ने पशुपालन और उन्नत नस्ल सुधार कार्यक्रम में दिलचस्पी दिखाई। महिलाओं की रूचि को देखते हुए कृषि उत्पादक आयुक्त ने पशुपालन विभाग के अधिकारियों को आगामी अप्रैल माह में इन महिलाओं को प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करने के निर्देश दिए है। चर्चा में महिलाओं ने बताया कि राष्ट्रीय कृषि मेले में आने से कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में नई तकनीकों की जानकारी मिली। यहां उन्हें बकरी पालन और मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण विशेषज्ञों द्वारा दिया गया है।

कृषि उत्पादन आयुक्त डॉ. मनिन्दर कौर द्विवेदी ने समूह की महिलाओं को पशु पालन विभाग द्वारा संचालित मैत्री प्रशिक्षण से जुडकर उन्नत पशु नस्ल सुधार के टीकाकरण कार्यक्रम, पशुओं का प्राथमिक उपचार, पशुधन बीमा सहित अन्य विभागीय योजनाओं का प्रचार-प्रसार करने को उत्साहित किया।

बहुद्देशीय कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ता (मैत्री) के रूप में स्वेच्छा से कार्य करने वाली महिलाओं को तीन माह का प्रशिक्षण दिया जाएगा जिसमें एक माह का लैब प्रशिक्षण एवं दो माह का फिल्ड प्रशिक्षण सम्मिलित है।प्रशिक्षण प्राप्त महिलाओं को ग्राम में पशु नस्ल सुधार के उपकरण निःशुल्क दिए जाएंगे। प्रशिक्षित महिलाओं को प्रोत्साहन राशि भी प्रदान की जाएगी। प्रशिक्षित महिलाओं द्वारा बहुउदेशीय कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ता (मैत्री) के रूप में कार्य किया जाएगा। कृत्रिम गर्भाधान में उन्नत नस्ल के साहीवाल, गिर, थारपारकर, रेडसिन्दी, जर्सी, एच.एफ. उन्नत नस्ल के बीज से गर्भाधान कराया जाता है। कृत्रिम गर्भाधान से उत्पन्न बछिया में अपने मां की तुलना में दूध देने की क्षमता बढ़ जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में दुध की उपलब्धता बढ़ने से एक ओर जहां किसानों की आय बढ़ेगी वहीं बच्चों में कुपोषण दूर करने के लिए भी मदद मिलेगी।

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